इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा देने वाले कैंडिडेट्स की मैथ्स पर पकड़ अच्छी होती है और यही विषय उनकी रैंकिंग पर भी असर डालता है। जब एग्जाम देने वालों का एग्रीगेट स्कोर यानी कुल नंबर एक जैसे होते हैं तो उन छात्रों को हायर रैंक मिल जाती है, जिन्होंने मैथ्स में ज्यादा नंबर हासिल किए होते हैं। जॉइंट एंट्रेंस एग्जामिनेशन (JEE Main) और 23 IIT कॉलेजों में एडमिशन के लिए होने वाले JEE (Advanced)-2025 के टाई ब्रेकर फॉर्मूले में वैसे तो कुछ अंतर है, लेकिन मैथ्स का फैक्टर दोनों एग्जाम में अहम है।
JEE (Advanced) 2025: जितने सही जवाब, उतनी हाई रैंक
IIT और कई दूसरे संस्थान में दाखिले के लिए होने वाले JEE (Advanced) में अगर छात्रों के बीच टाई होता है तो सबसे पहले यह देखा जाएगा कि किसको ज्यादा पॉजिटिव मार्क्स मिले हैं। पॉजिटिव मार्क्स की गणना छात्र की ओर से दिए गए सही जवाबों के आधार पर होती है।
स्टेप 1 के बाद भी कुछ छात्रों में टाई रहता है तो फिर स्टेप 2 में मैथ्स का नंबर आता है और जिनके मैथ्स में ज्यादा नंबर होते हैं, उनकी रैंक हाई हो जाती है। स्टेप 3 में फिजिक्स के नंबर देखे जाएंगे। अगर तीनों स्टेप के बाद भी कुछ छात्र कॉमन स्कोर पर रहते हैं तो उन सबको एक जैसी रैंक दे दी जाती है।
JEE Main: टाई ब्रेकर में मैथ्स सबसे पहले
जेईई मेन के टाई ब्रेकर नियम में सबसे पहले मैथ्स में एनटीए स्कोर को आधार बनाकर रैंक दी जाएगी। उसके बाद फिजिक्स, केमिस्ट्री का एनटीए स्कोर देखा जाएगा। तीनों सब्जेक्ट का एनटीए स्कोर कैलकुलेट करने के बाद भी कॉमन स्कोर रहता है तो फिर यह देखा जाएगा कि किन छात्रों ने ओवरऑल ज्यादा सही जवाब दिए हैं। उसके बाद भी कुछ कैंडिडेट बचते हैं तो मैथ्स में सही-गलत जवाब का रेश्यो, फिर फिजिक्स और उसके बाद केमिस्ट्री में यह रेश्यो देखा जाएगा।
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IIT में कोर्सेज की रेंज:
देश में 23 IIT हैं। अलग-अलग IIT में कोर्सेज को देखें तो 4 वर्ष का बी. टेक. और बैचलर ऑफ साइंस (बीएस) कोर्स तो है ही। इसके साथ ही कई जगह 5 वर्ष का ड्यूल डिग्री कोर्स बीटेक-एमटेक है। ड्यूल डिग्री बीएस-एमएस है।
पांच वर्ष का इंटीग्रेटिड एमटेक कोर्स है। इंटीग्रेटिड बीएस-एमएस कोर्स है। इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट को साथ पढ़ा जा सकता है। ड्यूटी डिग्री बीटेक-एमबीए कोर्स भी है, जो 5 साल के हैं। इन कोर्सेज में भी एडमिशन जेईई एडवांस्ड स्कोर के आधार पर ही होता है।
टाई ब्रेकर फॉर्मूला कितना सही?
करियर काउंसलर आलोक बंसल का कहना है कि जिस तरह से कॉम्पिटिशन का दौर है, उसमें टाई तो होगा ही। कुछ को मैथ्स में ज्यादा नंबर होने की वजह से पसंद का कॉलेज मिल जाएगा तो कोई सिर्फ मैथ्स में आधा या एक नंबर कम होने की वजह से भी रह जाएगा।
उनका कहना है कि चूंकि इन एग्जाम में नेगेटिव मार्किंग होती है और छात्र क्वेश्चन तो अटेम्प्ट करेगा ही, ऐसे में किसी एग्जाम में कितने सही जवाब या कितने गलत जवाब को टाई ब्रेकर नियमों में शामिल करने पर कुछ सवाल उठते हैं। जिस तरह से नॉर्मलाइजेशन की प्रक्रिया में सुधार की जरूरत है, उसी तरह से टाई ब्रेकर फॉर्म्युले में भी कुछ संशोधन होना चाहिए।